क्यों अमेरिका और ईरान का युद्ध रोकने की हर कोशिश फेल हो रही है

क्यों अमेरिका और ईरान का युद्ध रोकने की हर कोशिश फेल हो रही है

पश्चिम एशिया में शांति की बातें सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। अभी कुछ ही दिन पहले दोनों देशों के बीच युद्धविराम की सहमति बनी थी, लेकिन आज हकीकत सबके सामने है। अमेरिकी हवाई हमलों ने ईरान के छह प्रमुख शहरों को निशाना बनाया है। ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता हुसैन केर्मानपुर ने पुष्टि की है कि इन हमलों में अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है और 115 लोग घायल हुए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ नंबर नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि इस क्षेत्र में तनाव किस कदर बेकाबू हो चुका है।

लोग अक्सर सोचते हैं कि ये हमले अचानक हुए। सच यह नहीं है। यह पूरी लड़ाई होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण को लेकर है। जब ईरान ने अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों पर हमले किए, तो वॉशिंगटन ने इसका कड़ा जवाब देने का मन बना लिया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का साफ कहना है कि उनका मकसद ईरान की उस क्षमता को खत्म करना है जिससे वह समुद्री व्यापार में बाधा डालता है। लेकिन क्या हवाई हमलों से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है? बिल्कुल नहीं।

शांति समझौते का इतनी जल्दी टूटना क्या दिखाता है

पिछले महीने जून में दोनों देशों ने एक समझौता किया था। लगा था कि शायद अब हालात सुधरेंगे। वह समझौता इतनी जल्दी टूट जाएगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। ईरान के भीतर के कुछ कट्टरपंथी गुटों ने अपनी ही सरकार के फैसलों को दरकिनार करते हुए जहाजों पर दोबारा हमले शुरू कर दिए। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते को खारिज कर दिया और सीधे सैन्य कार्रवाई का आदेश दे दिया।

ईरान के चाबहार, बंदर अब्बास, बुशहर और इरानशहर जैसे शहरों में भारी तबाही हुई है। चाबहार में एक मैरीटाइम कंट्रोल टावर और डिपो को निशाना बनाया गया। इतना ही नहीं, अकी कल्ला में एक रेलवे ब्रिज को भी ध्वस्त कर दिया गया। हालांकि ईरान ने दावा किया है कि उसने 24 घंटे के भीतर इस पुल को दोबारा चालू कर दिया है, लेकिन नुकसान की भरपाई इतनी आसान नहीं होती। अस्पतालों से 102 लोगों को इलाज के बाद छुट्टी जरूर मिल गई है, लेकिन मानसिक खौफ सालों तक रहेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य का असली संकट और ईरान का रुख

इस पूरी जंग की असली जड़ को समझना जरूरी है। ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबफ का बयान इस बात को साफ करता है कि तेहरान पीछे हटने के मूड में नहीं है। उन्होंने खुलेआम कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य केवल ईरानी व्यवस्थाओं के तहत खुलेगा, अमेरिकी धमकियों से नहीं। ईरान का मानना है कि इस समुद्री रास्ते पर उसका पूरा अधिकार है और वह बाहरी ताकतों के दखल को बर्दाश्त नहीं करेगा।

इतिहास गवाह है कि जब भी इस रूट पर पाबंदी लगाने की कोशिश हुई है, वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। दुनिया का एक बड़ा तेल व्यापार इसी रास्ते से होता है। अगर यह रास्ता पूरी तरह बंद हुआ, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। अमेरिका इसी खतरे को टालने के लिए बार-बार अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर रहा है।

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जमीनी हकीकत और आगे का रास्ता

ईरानी अधिकारियों ने निजी तौर पर यह स्वीकार किया है कि जहाजों पर हमला करना एक बड़ी भूल थी। वे इसे कुछ कट्टरपंथियों की मनमानी बता रहे हैं जो बातचीत को पटरी से उतारना चाहते थे। लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका है। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई जल्द ही एक संदेश जारी करने वाले हैं। उनके पिता और पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद से ही देश के भीतर सत्ता का संतुलन बिगड़ा हुआ है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या दोनों देश फिर से मेज पर बैठेंगे? ओमान के रास्ते राजनयिक बातचीत शुरू करने की कोशिशें की जा रही हैं। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ओमान के दौरे पर जा रहे हैं ताकि इस समुद्री संकट का कोई राजनीतिक हल निकाला जा सके। अगर यह बातचीत भी बेनतीजा रही, तो आने वाले दिनों में और भयानक सैन्य टकराव देखने को मिल सकता है।

सैन्य कार्रवाई कभी भी कूटनीति का विकल्प नहीं हो सकती। वैश्विक महाशक्तियों को तुरंत दखल देकर दोनों पक्षों को बातचीत के लिए मजबूर करना होगा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए एक नया और मजबूत फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिए, वरना इस जंग की आग पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगी।

IL

Isabella Liu

Isabella Liu is a meticulous researcher and eloquent writer, recognized for delivering accurate, insightful content that keeps readers coming back.